रंग प्यार का….

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रंग हो होली का या प्यार का
थोडा खुमार तो चढ़ता है

ऐसे में याद आना उनका
इतना हक तो बनता है

कहते है लोग के प्यार के रंगों से
रहे रंगीन आपकी जिंदगी

फिर जिंदगी में बेरंग सा
वक्त क्यों बनता है

आते हो तुम कुछ पल के लिए
तुम्हे रोकने का हक तो मेरा बनता है

तुम कहो या न कहो
तुम्हारे पास आना तो मेरा बनता है

काश तुम समझती मेरी ख़ामोशी को
फिर भी मेरा खामोश रहना तो बनता है

रौशन

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दोस्ती…

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दोस्ती है क्या
ये जाना दोस्तों से
दूर आने के बाद

कभी सोचा नहीं था मैंने
के मेरी जिंदगी होगी
इतनी उदास

अब जाके जाना मैंने
के क्यूँ वो कहते है
के रौशन तू रह नहीं सकता
अकेले तन्हा

काश ऐसी न होती जिंदगी के
मुझे आना पड़ता दूर अपनों से

रौशन

फिर से है जेहन में एक सवाल ….

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बुझती  हुई  लौ  में
रूकती  हुई  साँसों  में
आपके  हर  ग़मों  के
आहों  में  मैं  नहीं

मैं  तो  हु  आपके
हर  अच्छे पलों  का  साथी
नहीं  में  आपके  ग़मों  का  साथी
क्यूँ ? ये  मैं  भी  न  समझ  पाया  अब  तक

अब  ये  हो  मानव  मन  की  चंचलता
जो  देख  ख़ुशी  मुड़  जाता  है ..
ग़मों  को  दिखा  के  अपनी  पीठ
क्या  है  सही  और  क्या  है  गलत
रख के उसको ताक पे

कब  समझा  है  ये  इंसान के
मन  है  सबसे  बड़ा  दुश्मन
आपका …क्यूँ ?
कभी  ये  खुद  से  पूछ  के  देखो
जिंदगी  की  ख़ुशी  में  है  पल  भर  की  ख़ुशी
पर  दुसरे  के  ग़मों  में  दे  के  साथ
जो  है  मिलती  ख़ुशी  वो  किसी   वरदान  से  कम  नहीं

रौशन