ढल रही है रात………….

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ढल रही है रात  धीरे-धीरे ,
सपने रहे है उड़ मेरे आस पास
जैसे हो मेरे भावनाओं की परछाईया

रात और दिल के बीच है
मेरे अपने भ्रम की दीवार
पता है इससे के ढल रही है रात
फिर भी दिल कहता है
रुक जाये रात की ये
गहरी और सुनसान पलें
रात  की इन बेदर्द  पलों में
रोना चाहता हू मैं
पर अब नहीं है आसूं इन आखों में

रात के अकेलेपन का है
एहसास मुझे पर अब
दिल को मेरे देती है सुकून
ये अकेलापन जो है बिखरी
चारो ओर मेरे

मुझे क्या था पता के
आने वाली है एक तूफानी सुबह
इस  खामोश से रात के बाद
रात की खामोसी में मैंने
सुनी बारिश के टिप टीपने को
लगा जैसे रो रहा है वों आसमां

अँधेरे के गहराई में पल पल
टूट रहे थे सपने मेरे
लगा जैसे दूर कहीं
कोई हो ले रहा नाम मेरा

रात ने किये उजागर मेरे
कमज़ोर नग्न आत्मा के
खोखलेपन को
जिसने दिखाई मेरे काल्पनिकता को,

खुद को काल्पनिक अर्थो में छिपाने के लिए
में गया था सब कुछ भूल
आज फिर लगा मुझे एक खालीपन मेरे आस पास
जैसे मेरे स्मृति की गहेरी गलिओं में उठा हो
एक दर्द ,

रात के ढलने में और
मेरे टूटने में जैसे रहा न कोई फर्क
ढल रही रात , मेरे हर एक आँसू के साथ

रौशन

4 thoughts on “ढल रही है रात………….

  1. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 14 – 9 – 2010 मंगलवार को ली गयी है …
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ …शुक्रिया

    http://charchamanch.blogspot.com/

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