जिन्दगी मुझे किस मुकाम

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जिंदगी  ये  मुझे  किस  मुकाम  पे  ले  आई
जहाँ  हर  तरफ  है  अँधेरा  और  तन्हाई

जिसकी  तरफ  है  बढाया  हमने  हाथ
उसी  ने  दिया  है  धका दो  कदम  के  बाद

जिंदगी  की  बेरहम  थापेरो  ने
तोड़ी  है  मेरी  हिम्मत  सारी

कल  थे  हम  घिरे  अपने चाहने  वालों  से
आज  है  मेरी  गलियां  बिरान

कल तक लगती थी जिन्हें मेरी बातें आच्छी
आज वही कहते है मत दे तू भाषण मुझे

कोई तो बता दो देने से पहले गलियां
के गलती क्या है मेरी..

रौशन

3 thoughts on “जिन्दगी मुझे किस मुकाम

  1. kittu

    जिन्दगी तुम्हे यह जिस मुकाम पर ले आई
    वहाँ ना हें अन्दर पर हें थोड़ी तन्हाई

    जिसकी तरफ था तुमने बढाया अपना हाथ
    वो न था देने लायक तुम्हारा साथ

    जिन्दगी ने बचाया था टूटने से दिल तेरा
    बनाया हें तुजे मजबूत दिया हें साथ तेरा

    कल तक जिनसे था तू घिरा वो न थे तेरे अपने
    जो चाहे तुजे दिल से वही हें तेरे अपने

    तेरी बाते हें हमेशा से अच्छी
    पर बुरी लगती हें कुछ लोगो को बाते सच्ची

  2. do took uthaya hai sawal apne
    lage hain ab to log kud ko hi janchne
    galti nahi thi apki koi, man me tha khot unke
    bas apne bane gairon ka charitra laga tha jhankne

    aise logon ki adat hoti hai purani
    pahle bante hain hmraaz apke
    phir lete hain chutki baanch ke apki kahani
    dhokha to inki fitrat me hota hai shamil
    bas rhna sambhal kr aur na jana inse jyada ghul-mil…………..

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