एक इल्तेज़ा

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हमें  तो  है मोहबत  आपसे
हम ये कह  न सके  आपसे
जब से टकराई  है नज़रें  आपसे
हम भूल गए सब कुछ

कभी हमें भी देखो प्यार  से
आपकी ये बेरुखी अब है तडपाती  हमें
हमने तो की है मोह्बात  आपसे
कोई गुनाह  तो नहीं किया

रोज़ गुज़रते  हैं आपकी गलीओं  से
इसी खावाशी  में के
कभी तो आप हमें मिल जाओ  उसी मोड़ पे
जहाँ हम मिले थे पहले  कभी

अब तो मेरे सपनो में हो सिर्फ़  आप
आप ही हो अब मेरे दिल में
सोचता हूँ बनाऊं आपको अपना
पर ये कह नही पाता कभी आपके सामने

जब  भी देखता हूँ आपको
मुझे नही रहता याद कुछ
आपके आगे भूल सा जाता हूँ,
मैं ख़ुद को

अब तो समझ जाओ आप
हमारे इन धडकनों को
जिनमें रहते हो आप
और आप ही रहते हो इन साँसो  में

जब तक चलेंगी  सांसे  हमारी
तब तक हम चाहेंगे आपको
भले आप हो न सके हमारे
फिर भी उन्ही  हम चाहेंगे आपको

बस है एक इल्तेज़ा आपसे
उन्ही रहना आप हमारे आस-पास कहीं

रौशन

2 thoughts on “एक इल्तेज़ा

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